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म॒न्द्रया॑ सोम॒ धार॑या॒ वृषा॑ पवस्व देव॒युः । अव्यो॒ वारे॑ष्वस्म॒युः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

mandrayā soma dhārayā vṛṣā pavasva devayuḥ | avyo vāreṣv asmayuḥ ||

पद पाठ

म॒न्द्रया॑ । सो॒म॒ । धार॑या । वृषा॑ । प॒व॒स्व॒ । दे॒व॒ऽयुः । अव्यः॑ । वारे॑षु । अ॒स्म॒ऽयुः ॥ ९.६.१

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:6» मन्त्र:1 | अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:26» मन्त्र:1 | मण्डल:9» अनुवाक:1» मन्त्र:1


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आर्यमुनि

अब परमात्मा से बल और आह्लाद की प्रार्थना की जाती है।

पदार्थान्वयभाषाः - (सोम) हे शान्त्यादिगुणसम्पन्न परमात्मन् ! आप (मन्द्रया) आह्लाद करनेवाली (धारया) वृष्टि से (पवस्व) हमको पवित्र करें, क्योंकि आप (वृषा) सब कामनाओं के देनेवाले हैं। (देवयुः) देवताओं के प्रिय हैं और (वारेषु अव्यः) पृथिव्यादि लोक-लोकान्तरों में व्यापक हैं। आप (अस्मयुः) हमको प्राप्त होकर आनन्दित करें ॥१॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा इस ब्रह्माण्ड में सर्वत्र विराजमान है। दैवी सम्पत्तिवाले लोग उसको पा सकते हैं। इस अभिप्राय से परमात्मा को इस मन्त्र में देवप्रिय कथन किया गया है। वस्तुतः परमात्मा न किसी का प्रिय और न किसी का द्वेषी है ॥१॥
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आर्यमुनि

अथ परमात्मनः सकाशाद्बलमाह्लादश्च प्रार्थ्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - (सोम) हे शान्त्यादिगुणसम्पन्न परमात्मन् ! भवान् (मन्द्रया) आह्लादिकया (धारया) वृष्ट्या (पवस्व) अस्मान् पुनातु यतो भवान् (वृषा) सर्वकामनाप्रदः (देवयुः) देवप्रियः (वारेषु अव्यः) पृथ्व्यादिविविधलोकेषु व्यापकश्चास्ति भवान् (अस्मयुः) अस्मान्सदेच्छन् प्रीणातु ॥१॥